Hindi Class 10th Bihar Board news

जीत जीत में निरखत हूँ Objective Question | जीत जीत में निरखत हूँ Subjective Question | Bseb 10th

प्रश्न 1. किनके साथ नाचते हुए बिरजू महाराज को पहली बार प्रथम पुरस्कार मिला ?

उत्तर : अपने चाचा शम्भू महाराज और अपने पिताजी के साथ।

 

प्रश्न 2. बिरजू महाराज अपना सबसे बड़ा जन किसको मानते थे ?

उत्तर : अपनी माँ को।

 

प्रश्न 3. पंडित बिरजू महाराज किस नृत्य में मशहूर हुए ?

उत्तर : कथक नृत्य

 

प्रश्न 4. पं० बिरजू महाराज का जन्म कहाँ हुआ था ?

उत्तर : लखनऊ के जफरीन अस्पताल में।

 

प्रश्न 5. पं० बिरजू महाराज वृक्षों के पत्तों में क्या देखते हैं?

उत्तर : ईश्वर को

 

प्रश्न 6. बिरजू महाराज के अनुसार राधा श्याम कैसे हो गई ?

उत्तर : श्याम को देखते-देखते।

 

प्रश्न 7. पं० बिरजू महाराज का दुखद दिन कौन-सा रहा ?

उत्तर : जब उनके पिताजी की मृत्यु हुई थी। ने साइकिल क्यों खरीदी ?

 

प्रश्न 8. पं० बिरजू महाराज ने साइकिल क्यों खरीदी ?

उत्तर : किराए के पैसे बचाने के लिए।

 

प्रश्न 9. पं० बिरजू महाराज की शादी कितने वर्ष की उम्र में हुई ?

उत्तर : 18 वर्ष की उम्र में।

 

प्रश्न 10. पं० बिरजू महाराज को आगे बढ़ाने में किसका हाथ था ?

उत्तर: उनकी माँ का।

 

                            लघु उत्तरीय 

 

प्रश्न 1. लखनऊ और रामपुर से बिरजू महाराज का क्या संबंध है ?

उत्तर :  लखनऊ में पं० बिरजू महाराज का जन्म हुआ था। रामपुर में उनकी बड़ी बहनों का जन्म हुआ था। वहाँ वे भी बहुत दिनों तक रहे थे। उनके पिताजी रामपुर में 22 साल तक रहे थे।

 

प्रश्न 2. रामपुर के नवाद की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद क्यों चढ़ाया ?

उत्तर : रामपुर के नवाब की नौकरी छूटने पर हनुमान जी को प्रसाद इसलिए चढ़ाया गया क्योंकि नौकरी करने से इन्हें मुक्ति या स्वतन्त्रता मिली। नवाब चाहता था कि ये भी अपने पिता के साथ-साथ उनके यहाँ नौकरी करे। इनके पिताजी और माँ नहीं चाहते थे कि वे उसके यहाँ रहें।

 

प्रश्न 3. नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल बिरजू महाराज किस संस्था से जुड़े और वहाँ किनके सम्पर्क में आए ?

उत्तर नृत्य की शिक्षा के लिए पहले-पहल विरजू महाराज ‘हिन्दुस्तानी डान्स म्युजिक’ संस्थान से जुड़े। उसी समय वे वहाँ कपिला वात्स्यायन जी, लीला कृपलानी आदि के सम्पर्क में आए।

 

प्रश्न 4. बिस्जू महाराज के गुरु कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दें।

उत्तर:- विरजू महाराज के गुरु उनके पिताजी ही थे। उनका नाम लच्छू महाराज था। ये रामपुर के नवाब के यहाँ नौकरी करते थे। वे समय के साथ चलने वाले थे। रामपुर के नवाब चाहते थे कि उनका बेटा भी उनके यहाँ रहे। यह उन्हें मंजूर नहीं था। नौकरी छूट गई तो वे खुश हुए और हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाए। जब वे मात्र 54 वर्ष के ही थे कि उन्हें लू लग गई थी। वे अपनी बीमारी को छिपाते रहे। कुछ ही दिनों के बाद पिताजी की मृत्यु हो गई।

 

प्रश्न 5. बिरजू महाराज ने नृत्य की शिक्षा किसे और कब देनी शुरू की ?

उत्तर:- बिरजू महाराज ने सीताराम बागला नामक एक लड़के को नृत्य की शिक्षा देनी शुरू की जब वे मात्र 10-11 साल के थे। उस समय इनके पिताजी की मृत्यु हो गई थी। उनके घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी। घर चलाने के लिए इनके पास यही एक उपाय था।

 

प्रश्न 6. बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुःखद समय कब आया ? उससे संबंधित प्रसंग का वर्णन कीजिए।

उत्तर:- बिरजू महाराज के जीवन में सबसे दुःखद समय उस समय आया था जब इनके पिताजी की मृत्यु हो गई थी। उस समय इनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि उनकी दसवीं और तेरहवीं के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। उस दस दिन के बीच में उन्होंने दो जगह दो प्रोग्राम किए। उससे जो पैसे मिले थे। उसी से उन्होंने पिताजी का क्रियाकर्म अर्थात् श्राद्ध किया।

 

प्रश्न 7. शम्भू महाराज के साथ बिरजू महाराज के संबंध पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: शम्भू महाराज बिरजू महाराज के चाचा थे। पहली बार जब वे अपने चाचा और पिताजी के साथ नाचे थे तो प्रथम पुरस्कार इन्हें ही मिला था। इसपर इनके चाचा शम्भू महाराज ने कहा था कि बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ भी सुभान अल्लाह। जब इनके पिताजी की मृत्यु हो गई तो इनके चाचा ने इनकी कोई सहायता नहीं की ऊपर से गाली-गलौज करते। जिन्दगी जीने के लिए इन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा।

 

प्रश्न 8. कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नतक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर:- कलकत्ते के दर्शकों की प्रशंसा का बिरजू महाराज के नर्तक जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा। उस प्रोग्राम के बाद सारे अखवारों में ये छा गए। सभी ने इनकी प्रतिभा को स्वीकारा फिर जगह जगह से इन्हें बुलावा आने लगा और इनके जीवन में जो दुख का अँधेरा था वह हमेशा के लिए समाप्त हो गया। ये कमाने के पीछे कम और अपनी कला को सँवारने के पीछे ज्यादा समय देने लगे और इसका परिणाम यह हुआ कि, हालाँकि इसे कहना जरूरी नहीं है क्योंकि बिरजू महाराज आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है, आज कला की दुनिया में बिरजू महाराज अनूठा व्यक्तित्व हैं।

 

प्रश्न 9. संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या क्या थी ?

उत्तर: संगीत भारती में बिरजू महाराज की दिनचर्या थी सुबह चार बजे उठना, चाहे बुखार हो या सर्दी सुबह पाँच बजे से आठ बजे तक रियाज करना फिर घर जाना। एक घंटे में तैयार होकर वापस फिर नौ बजे आकर 2 घंटे का क्लास लेना। वे वहाँ तीन साल तक बहुत अभ्यास किए। थक जाते तो किसी न किसी वाद्ययंत्र को लेकर बैठ जाते।

 

प्रश्न 10. बिरजू महाराज कौन-कौन से वाद्य बजाते थे ?

उत्तर: बिरजू महाराज सितार, गिटार, हारमोनियम, बाँसुरी, तबला, सरोद इत्यादि वाद्य बजाते थे।

 

प्रश्न 11. अपने विवाह के बारे में विस्जू महाराज क्या बताते हैं ?

उत्तर:- अपने विवाह के बारे में बिरजू महाराज बताते हैं कि उनका विवाह मात्र 18 वर्ष की उम्र में हो गई। वे कहते हैं कि उस समय अगर उनका विवाह नहीं होता तो अच्छा होता क्योंकि परिवार की जवाबदेही बढ़ जाने से उनका संघर्ष और बढ़ गया। वे नृत्य को ज्यादा समय नहीं दे पाते थे। उनके पिता की मृत्यु से डरकर उनकी माँ ने उनकी शादी करवा दी थी।

 

प्रश्न 12. बिरजू महाराज की अपने शामिदों के बारे में क्या राय है ?

उत्तर : बिरजू महाराज अपने शागिदों में से रश्मि जी के बारे में बताते हैं कि वे बहुत दिनों से लगी हुई है। शाश्वती भी 15-20 साल से लगी हुई हैं, अब उनकी कला में निखार आ गया है। विदेशी शागिदों में वैरोनिक लगी हुई हैं। अधिकांश तो ऐसे हैं जो तालियाँ बटोरी, पैसे कमाए और चल दिए। कला साधना नहीं करते। उन्होंने कृष्णमोहन, राममोहन के बारे में बताया कि वे भी ध्यान नहीं देते हैं। स्वयं महाराज के पुत्र भी ध्यान नहीं देते हैं। इनका कला के प्रति त्याग नहीं है। मौज लेते हैं, नाचते हैं तो उसे भी एक एन्जॉय सोचकर कर लेते हैं।

 

प्रश्न 13.  पुराने और आज के नर्तकों के बीच बिरजू महाराज क्या फर्क पाते हैं ?

उत्तर: पुराने नर्तक बेचारे को जैसा मंच मिल जाता था उसी पर प्रोग्राम कर लेते थे। परन्तु आज के नर्तक स्टेज की खराधियों का बखान करते रहते हैं। ये कहते हैं कि स्टेज टेढ़ा है, बड़ा खराब है, गड्ढा है इत्यादि। पुराने नर्तक तो अपने आपको बचाते रहते थे। एयरकंडीशन की ठंढक कहाँ उन्हें तो पेट्रोमैक्स की गर्मी भी बर्दाश्त करनी पड़ती थी, पंखा झलनेवालों के पंखों से भी बचना पड़ता था।

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