Hindi Class 10th

नाखून क्यों बढ़ते हैं Objective Question Bihar Board | Bseb 10th MVVI Objective Question

(1). लेखक के अनुसार सहजात वृत्ति किसका नाम है ?

उत्तर : लेखक के अनुसार सहजात वृत्ति अनजानी स्मृतियों का नाम है।

(2). ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं ? यह प्रश्न लेखक के आगे कैसे उपस्थित हुआ ?

उत्तर : नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह प्रश्न लेखक के आगे उनकी बेटी ने रखा।

(3). नाखून बढ़ना किस चीज का प्रमाण है ?

उत्तर : नाखून बढ़ना आदिम पाशविक वृत्ति और संघर्ष चेतना का प्रमाण है।

(4). लेखक के अनुसार नाखून काटना किस चीज़ का प्रमाण है ?

उत्तर नाखून काटना मनुष्य के सौंदर्यबोध और सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण है।

(5). देवताओं के राजा का वज्र किनकी हड्डियों से बना था ?

उत्तर : दधीचि मुनि की हड्डियों से।

(6). अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति किस चीज की विरोधिनी है ?

उत्तर : मनुष्यता की विरोधिनी ।

(7). ‘दाँत का सहारा लेकर जीने वाले को क्या कहते हैं ?

उत्तर : दंतावलंबी कहते हैं।

(8). जीवन रक्षा के लिए नाखून कब जरूरी थे ?

उत्तर : आदिकाल में।

(1).बढ़ते नाखूनों के द्वारा प्रकृति मनुष्य को क्या याद दिलाती है?

उत्तर:- बढ़ते नाखूनों के द्वारा प्रकृति मनुष्य को याद दिलाती है कि तुम यही लाख च के पहले के नख-दंतावलंबी जीव हो पशु के साथ एक ही सतह पर विचरण करने वाले और चरने वाले।

(2). लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना कहाँ तक संगत है ?

उत्तर:- लेखक द्वारा नाखूनों को अस्त्र के रूप में देखना उचित ही है, क्योंकि आदिमानव का मुख्य अब नाखून ही था। दाँत भी अन्य के रूप में था परन्तु नाखून के बाद उस समय वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को नाखूनों से ही पछाड़ता था। आज भी मानव जब अकेले किसी से लड़ेगा और उसके पास कोई अस्थ नहीं होगा तो वह सर्वप्रथम इसी का प्रयोग करेगा।

(3). मनुष्य बार-बार नाखूनों को क्यों काटता है?

उत्तर : मनुष्य बार-बार नाखूनों को इसलिए काटता है क्योंकि वे रोज बढ़ते हैं। वे रोज इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि ये अंधे हैं, नहीं जानते कि मनुष्य को इससे कोटि-कोटि गुणा शक्तिशाली अस्त्र मिल चुका है।

 

(4). सुकुमार बिनोदों के लिए नाखून को उपयोग में लाना मनुष्य ने कैसे शुरू किया ? लेखक ने इस संबंध में क्या बताया है ?

उत्तर:- कुछ हजार साल पहले नाखून शायद विलासी आदमी के किसी काम आते थे। लेखक ने इस संबंध में बताया है कि उस समय गौड़ देश के लोग बड़े-बड़े नख रखना पसंद करते थे और दक्षिणात्य लोग छोटे नथ इसे इन्होंने देश और काल की अपनी-अपनी रुचि बताया है। ये कहते हैं समस्त अयोगामिनी. वृत्तियों को और नीचे खींचनेवाली वस्तुओं को भारतवर्ष ने मनुष्योथित बनाया है, यह बात चाहूँ भी तो भूल नहीं सकता।

(5).नख बढ़ाना और उन्हें काटना कैसे मनुष्य की सहजात वृत्तियाँ हैं? इनका क्या अभिप्राय है?

उत्तर :- नख बढ़ाना और काटना मनुष्य की सहजात वृत्ति है। नख पढ़ाना पशुत्य का प्रमाण है और उन्हें काटना मनुष्यता की निशानी है। लेखक का अभिप्राय है कि पशुत्य के चिह्न मनुष्य के भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे पढ़ नहीं सकता इसलिए वह इसे काट देता है।

(6). लेखक क्यों पूछता है कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर ? स्पष्ट करें।

उत्तर:- लोग अस्त्र-शस्त्र बढ़ा रहे हैं इसलिए लेखक पूछते हैं कि मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है, पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर।

(7). देश की आजादी के लिए प्रयुक्त किन शब्दों की अर्थ मीमांसा लेखक करता है और लेखक का निष्कर्ष क्या है?

उत्तर:- लेखक देश की आजादी के लिए प्रयुक्त इण्डिपेण्डेन्स’ शब्द की अर्थ मीमांसा करते हैं। लेखक कहते हैं कि ‘इण्डिपेण्डेन्स’ शब्द का अर्थ है अनधीनता, पर ‘स्वाधीनता’ शब्द का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। वे कहते हैं कि हम भारतवासी ने आजादी के नामकरण के लिए जितने भी शब्द लिए उसमें स्व का बंधन अवश्य है। वे कहते हैं कि हमारी समूची परंपरा ही अनजाने में, हमारी भाषा के द्वारा प्रकट होती रही है।

(8). लेखक ने किस प्रसंग में कहा है कि बंदरिया मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती ?लेखक का अभिप्राय स्पष्ट करें।

उत्तर:- लेखक ने संस्कृति की विशेषता बताने के प्रसंग में कहा है कि यह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है कि हम अपने आप पर लगाए हुए बंधन को नहीं छोड़ सकते, क्योंकि यह हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है। परन्तु पुराने का ‘मोह’ सब जगह वांछनीय है। मरे हुए बच्चे को गोद में दबाए रहने वाली ‘बंदरिया’ मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती। लेखक का अभिप्राय यह है कि जो चीजें छोड़ देने में भलाई है, उसे छोड़ देना चाहिए।

(9). ‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक क्या बताता है?

उत्तर:- ‘स्वाधीनता’ शब्द की सार्थकता लेखक बताते हैं कि अपने ऊपर नहीं करने योग्य कामों के लिए अंकुश लगाना अर्थात् अपने आपको अपने अनुशासन में रखना इसपर किसी बाह्य चीजों यहाँ तक कि ज्ञानेन्द्रियों को भी उस पर हावी नहीं होने देना।

(10). निबंध में लेखक ने किस बूढ़े का जिक्र किया है? लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता क्या है?

उत्तर:- निबंध में लेखक ने उस बूढ़े का जिक्र किया है जिसने कहा था कि बाहर की ओर नहीं, भीतर की ओर देखो, हिंसा को मन से दूर करो, मिथ्या को हटाओ, क्रोथ और द्वेष को दूर करो, लोक के लिए कष्ट सहो, आराम की बात सोचो, प्रेम की बात सोचो, आत्मतोषण की बात सोचो, काम करने की बात सोचो। उसने कहा- प्रेम ही बड़ी चीज है, क्योंकि वह हमारे भीतर है। लोगों ने बूढ़े की बात समझी नहीं और उसे गोली मार दी। लेखक की दृष्टि में बूढ़े के कथनों की सार्थकता है क्योंकि उसने मनुष्य की वास्तविक चरितार्थता का पता लगाया था। मनुष्य ने अपनी बढ़ती हुई पशुता को नहीं रोका और अभी वह विनाश के कगार पर है।

(11). मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएंगे। प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में कैसी आशा जगती है ?

उत्तर:- मनुष्य की पूँछ की तरह उसके नाखून भी एक दिन झड़ जाएंगे। प्राणिशास्त्रियों के इस अनुमान से लेखक के मन में यह आशा जगती है कि शायद उस दिन मनुष्य की पशुता भी लुप्त हो जाएगी। उस दिन वह मारणास्त्रों का प्रयोग भी बंद कर देगा और प्राणिमात्र से प्यार करेगा फिर यह पृथ्वी ही स्वर्ग बन जाएगी।

(12).’सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता किस प्रकार प्रतिपादित करता है ?

उत्तर:- ‘सफलता’ और ‘चरितार्थता’ शब्दों में लेखक अर्थ की भिन्नता इस प्रकार प्रतिपादित करते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य मारणास्त्रों के संचयन से, बाह्य उपकरणों के बाहुल्य से उस वस्तु को भी पा सकता है, जिसे उसने बाह्य आडंबर के कारण सफलता नाम दिया है। परंतु, मनुष्य की चरितार्थता प्रेम में है, मैत्री में है, याग में है, अपने को सबके मंगल के लिए निःशेष भाव से देने में है।

(13). लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता क्या है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:- लेखक की दृष्टि में हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है-अपने-आप पर अपने-आप के द्वारा लगाया हुआ बंधन। हमारी परंपरा में बहुत पहले से आत्मानुशासन की बात चली आ रही है जिसमें हम न करने योग्य कामों के लिए अपने आप पर अंकुश लगाते हैं।

(14). ‘नाखून क्यों बढ़ते हैं’ का सारांश प्रस्तुत करें।

उत्तर:- नाखून क्यों बढ़ते हैं शीर्षक निबंध को हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने मनुष्य में पाशविक वृत्ति के बढ़ने और मनुष्य को इसे घटाने के प्रयत्न को व्यक्त किया है। लेखक कहते हैं कि नाखून का बढ़ना एक सहज वृत्ति है, परन्तु मनुष्य के द्वारा उसका काटना भी एक सहजात वृत्ति है।

इस कहानी में लेखक अपने संस्कार से खुश होते हैं कि हमारा संस्कार हमें कभी बुरा बनने नहीं देगी। अनजाने में भी यह हमारी रक्षा करती है। आजादी तो हमें है परन्तु हम अपने ही अधीन हैं। अपने अधीन का मतलब है कि हमारा संस्कार हमें यह सब कुछ करने से रोकता है, जो प्राणिमात्र को कष्ट देता है। वह हमें गलत होने या गलत करने से रोकता है।

कभी-कभी लेखक उदास हो जाते हैं। उन्हें निराशा घेर लेती है। वे सोचते है कि अगर मनुष्य मनुष्य हो जाता तो हिरोशिमा और नागासाकी जैसे कुकृत्य कभी नहीं करता, वह मानव का दुश्मन कभी नहीं बनता। मनुष्य परमाणु परीक्षण मानव की भलाई के लिए करता, मानव के विनाश के लिए नहीं। वे कहते हैं कि मनुष्य त्याग और प्रेम के पाठ को क्यों नहीं समझ पाता है ?

कहानी के अंत में लेखक फिर से आशावादी होते हैं। वे कहते हैं कि नाखूनों का बढ़ना मनुष्य की उस अंध सहजात वृत्ति का परिणाम है, जो उसके जीवन में सफलता ले आना चाहती है, उसको काट देना ‘स्व’ निर्धारित आत्म बंधन का फल है, जो उसे चरितार्थता की ओर ले जाना चाहती है। मनुष्य की पाशविक वृत्तियाँ बढ़ेंगी पर मानव हमेशा उस पर नियंत्रण करेगा, नाखून काटकर।

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